हमारे महापुरुष
त्याग, सेवा और संघर्ष के प्रतीक
महाराजा रणजीत सिंह (शेर-ए-पंजाब)
महाराजा रणजीत सिंह (1780–1839), जिन्हें “शेर-ए-पंजाब” कहा जाता है, सिख साम्राज्य के संस्थापक और महान शासक थे। उनका जन्म 13 नवम्बर 1780 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में) में सुकरचकिया मिस्ल के जाट सिख परिवार में हुआ। बारह वर्ष की आयु में ही पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने नेतृत्व संभाला और अपनी वीरता, कूटनीति तथा दूरदर्शिता के बल पर धीरे–धीरे पंजाब की विभिन्न मिस्लों (सिख संघों) को एकजुट किया। 1801 में उन्होंने लाहौर को राजधानी बनाकर स्वयं को पंजाब का महाराजा घोषित किया और इस तरह सिख साम्राज्य की नींव रखी।
रणजीत सिंह का साम्राज्य कश्मीर से लेकर पेशावर तक फैला और वे उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली शासकों में गिने गए। उनकी खालसा फ़ौजअनुशासन, साहस और आधुनिक युद्धकला का अद्वितीय उदाहरण थी। उन्होंने यूरोपीय सैन्य अधिकारियों को नियुक्त कर सेना को अत्याधुनिक हथियारों और प्रशिक्षण से सुसज्जित किया। इस कारण अंग्रेज़ और अफ़ग़ान दोनों ही उनसे भयभीत रहते थे।
उनकी धार्मिक नीति अत्यंत उदार थी। उन्होंने सिखों, हिंदुओं और मुसलमानों सभी को प्रशासन और सेना में महत्वपूर्ण स्थान दिया। उनके शासनकाल में कला और स्थापत्य को भी विशेष प्रोत्साहन मिला। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का गुंबद सोने से मढ़वाने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अनेक गुरुद्वारों, मंदिरों और मस्जिदों का जीर्णोद्धार कराया।
27 जून 1839 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी स्मृति आज भी “शेर-ए-पंजाब” के रूप में जीवित है। वे सच्चे अर्थों में साहस, धार्मिक सहिष्णुता और दूरदर्शिता के प्रतीक थे। उनका शासनकाल भारत के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है।
अमर शहीद भगत सिंह
अमर शहीद भगत सिंह (1907–1931) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रेरणादायक और साहसी नायकों में गिने जाते हैं। उनका जन्म 28 सितम्बर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गाँव (अब पाकिस्तान में) में हुआ। बचपन से ही वे स्वतंत्रता की ललक से भरे हुए थे। किशोरावस्था में ही उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड और लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज जैसी घटनाएँ देखीं, जिन्होंने उनके मन में अंग्रेज़ी शासन के प्रति गहरा आक्रोश पैदा किया।
भगत सिंह ने लाहौर के नेशनल कॉलेज से पढ़ाई की और इसी दौरान वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए। उन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) की सदस्यता ली और सशस्त्र संघर्ष को स्वतंत्रता प्राप्ति का रास्ता माना। 1928 में लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए उन्होंने और उनके साथियों ने अंग्रेज़ अधिकारी सांडर्स की हत्या की। 1929 में उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ दिल्ली असेंबली में बम फेंका, जिसका उद्देश्य किसी को मारना नहीं बल्कि “बहरों को सुनाना” था।
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर जेल में फाँसी दे दी गई। उस समय वे केवल 23 वर्ष के थे, लेकिन उनकी शहादत ने देशभर में आज़ादी की ज्वाला भड़का दी। भगत सिंह युवाओं के आदर्श बन गए और उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। वे समाजवाद, समानता और स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। उनकी अमर गाथा भारतीय इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है और वे आज भी साहस, बलिदान और देशभक्ति के प्रतीक के रूप में याद किए जाते हैं।
चौधरी चरण सिंह
चौधरी चरण सिंह (1902–1987) भारतीय राजनीति में किसानों की आवाज़ और “किसानों के मसीहा” के रूप में प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म 23 दिसम्बर 1902 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के नूरपुर गाँव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्होंने ग्रामीण समाज की कठिनाइयों को देखा और किसानों की समस्याओं से गहराई से परिचित हुए। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई की और राजनीति में प्रवेश कर किसानों के अधिकारों की रक्षा को अपना लक्ष्य बनाया।
चरण सिंह ने ज़मींदारी प्रथा और किसानों के शोषण के खिलाफ जोरदार संघर्ष किया। उन्होंने भूमि सुधार कानून बनाए और छोटे किसानों तथा खेतिहर मजदूरों को राहत दिलाई। उनका मानना था कि भारत की असली ताक़त गाँवों और खेतों में बसती है, इसलिए किसानों और ग्रामीण विकास पर विशेष ध्यान देना ज़रूरी है। उनकी नीतियों और आंदोलनों ने उत्तर भारत के किसान समाज को एक नई दिशा दी।
राजनीतिक जीवन में वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और बाद में भारत के प्रधानमंत्री भी बने। हालाँकि प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल 1979–1980 तक ही सीमित रहा, लेकिन इस दौरान भी उन्होंने किसानों और ग्रामीण जनता के मुद्दों को प्राथमिकता दी। वे हमेशा सादगीपूर्ण जीवन जीते रहे और ईमानदारी की मिसाल बने।
चौधरी चरण सिंह का जीवन संघर्ष, सादगी और किसान–हितैषी नीतियों का प्रतीक है। उन्हें आज भी भारत में किसानों का सच्चा नेता और “किसानों का मसीहा” कहा जाता है। उनकी सोच और नीतियाँ आज भी किसानों और ग्रामीण भारत के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई हैं।
चौधरी देवी लाल
चौधरी देवी लाल (1914–2001) हरियाणा के प्रख्यात किसान नेता, समाजसेवी और जननायक थे। उनका जन्म 25 सितम्बर 1914 को हरियाणा के सिरसा जिले के तेजाखेड़ा गाँव में हुआ। वे एक साधारण किसान परिवार से थे और बचपन से ही ग्रामीण समाज की कठिनाइयों को देख रहे थे। किशोरावस्था में ही वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए और अंग्रेज़ों के खिलाफ संघर्ष किया। जेल यात्राएँ और कठिनाइयाँ उनके जीवन का हिस्सा रहीं, लेकिन उन्होंने अपने आदर्शों से कभी समझौता नहीं किया।
स्वतंत्रता के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और किसानों तथा आम जनता के हक़ की लड़ाई को अपना जीवन–उद्देश्य बनाया। हरियाणा की राजनीति में वे एक बड़ी ताक़त के रूप में उभरे और “ताऊ” के नाम से लोकप्रिय हुए। वे दो बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने और 1989 में देश के उप–प्रधानमंत्री भी बने। उनके कार्यकाल में ग्रामीण विकास, सिंचाई, बिजली और शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया गया। उन्होंने किसानों को उचित मूल्य दिलाने और कर्ज़ से राहत दिलाने के लिए कई कदम उठाए।
चौधरी देवी लाल का जीवन पूरी तरह किसानों और गरीबों को समर्पित था। उनकी पहचान एक सादगीपूर्ण और ईमानदार नेता की रही। जनता उन्हें “किसानों का सच्चा मसीहा” और “जननायक” कहती है। हरियाणा और उत्तर भारत की राजनीति में उनका योगदान अमूल्य है। 6 अप्रैल 2001 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी स्मृति आज भी लाखों किसानों और ग्रामीण जनता के दिलों में जीवित है।
कुंवर नटवर सिंह
कुंवर नटवर सिंह (जन्म 16 मई 1931) भरतपुर (राजस्थान) के शाही परिवार से ताल्लुक रखते हैं और भारत के प्रमुख कूटनीतिज्ञ, राजनीतिज्ञ और लेखक रहे हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वे भारतीय विदेश सेवा (IFS) में शामिल हुए और भारत के कई महत्वपूर्ण देशों में राजनयिक के रूप में कार्य किया। चीन, अमेरिका और अफ्रीकी देशों में उनकी तैनाती रही, जिसने उन्हें अंतरराष्ट्रीय राजनीति की गहरी समझ दी।
नटवर सिंह की कूटनीतिक सेवाओं ने उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई। वे संयुक्त राष्ट्र में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और कई बार भारत की विदेश नीति को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई। उनकी सादगीपूर्ण शैली और स्पष्ट वक्तव्य ने उन्हें अलग पहचान दी।
विदेश सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद वे सक्रिय राजनीति में आए और कांग्रेस पार्टी से जुड़े। 1984 में वे लोकसभा सदस्य बने और 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार में भारत के विदेश मंत्री बने। हालाँकि उनका कार्यकाल संक्षिप्त रहा, फिर भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति को मज़बूत करने में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही।
नटवर सिंह एक अच्छे लेखक भी हैं। उन्होंने अपनी आत्मकथा “One Life is Not Enough” सहित कई किताबें लिखीं, जिनमें भारतीय विदेश नीति और राजनीति का गहन विश्लेषण मिलता है। उनका जीवन राजनयिक सेवा, राजनीति और साहित्य – तीनों क्षेत्रों में अद्वितीय योगदान का उदाहरण है। वे आज भी अपनी बेबाक राय और लेखन के लिए जाने जाते हैं।
चौधरी अजीत सिंह
चौधरी अजीत सिंह (1939–2021) भारत के प्रख्यात किसान नेता और वरिष्ठ राजनीतिज्ञ थे। वे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पुत्र थे और पिता की किसान–आधारित राजनीति को आगे बढ़ाया। उनका जन्म 12 फरवरी 1939 को मेरठ जिले (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वे अमेरिका गए और वहाँ से कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री लेकर लौटे। इसके बाद उन्होंने राजनीति को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और किसानों की समस्याओं को केंद्र में रखा।
अजीत सिंह ने राजनीति की शुरुआत कांग्रेस से की, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। वे कई बार लोकसभा सांसद बने और विभिन्न केंद्र सरकारों में मंत्री पद संभाले। उनका राजनीतिक जीवन कृषि और ग्रामीण विकास से गहराई से जुड़ा रहा। उन्होंने राष्ट्रीय लोकदल (RLD) पार्टी की स्थापना की, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों और ग्रामीण जनता की सशक्त आवाज़ बनी।
केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने उद्योग, कृषि और संचार जैसे क्षेत्रों में कार्य किया। किसानों के लिए बेहतर समर्थन मूल्य, सिंचाई और कर्ज़ माफी जैसे मुद्दों को उन्होंने लगातार उठाया। उनकी राजनीति का आधार हमेशा ग्रामीण भारत और किसान रहे।
6 मई 2021 को कोविड-19 के कारण उनका निधन हो गया। चौधरी अजीत सिंह को आज भी किसानों की आवाज़ बुलंद करने वाले नेता के रूप में याद किया जाता है। उनकी पार्टी और उनका परिवार अब भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय है। वे सच्चे अर्थों में किसान–आधारित राजनीति के ध्वजवाहक और अपने पिता चौधरी चरण सिंह की विरासत के उत्तराधिकारी थे।
राजा महेन्द्र प्रताप सिंह
राजा महेन्द्र प्रताप सिंह (1886–1979) स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी, समाज सुधारक और शिक्षाविद थे। उनका जन्म 1 दिसम्बर 1886 को उत्तर प्रदेश के हथीनी गाँव (अलीगढ़ ज़िला) में जाट राजघराने में हुआ। बचपन से ही उनमें देशभक्ति की भावना प्रबल थी। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और छात्र जीवन में ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। उनका जीवन विलासिता से दूर, समाज और राष्ट्र की सेवा को समर्पित था।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वे विदेश गए और 1915 में काबुल (अफ़ग़ानिस्तान) में “अंतर्राष्ट्रीय प्रोविजनल सरकार” की स्थापना की। इसे भारत की पहली निर्वासित सरकार माना जाता है। इस सरकार में वे राष्ट्रपति बने और क्रांतिकारी नेताओं के साथ मिलकर भारत की आज़ादी के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने का प्रयास किया। वे विश्व भ्रमण करते रहे और कई देशों से भारत की स्वतंत्रता के लिए मदद माँगी। उनके इस योगदान ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिलाया।
आज़ादी की लड़ाई के साथ–साथ वे शिक्षा और समाज सुधार को भी उतना ही महत्व देते थे। उनका मानना था कि शिक्षा ही समाज को नई दिशा दे सकती है। इसी उद्देश्य से उन्होंने अलीगढ़ में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की, जहाँ सभी वर्गों और समुदायों के बच्चों को समान शिक्षा दी जाती थी। यह संस्थान आज भी उनके महान योगदान की गवाही देता है।
राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का जीवन स्वतंत्रता, शिक्षा और सामाजिक समानता के लिए संघर्ष का प्रतीक है। 1979 में उनका निधन हुआ, लेकिन वे हमेशा एक ऐसे योद्धा और दूरदर्शी नेता के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र और समाज की सेवा में समर्पित किया।
अमर शहीद राजा नाहर सिंह
अमर शहीद राजा नाहर सिंह (1821–1858) बल्लभगढ़ (वर्तमान फरीदाबाद, हरियाणा) के जाट शासक थे और 1857 की महान क्रांति के अमर सेनानियों में से एक थे। उनका जन्म 6 अप्रैल 1821 को हुआ और पिता राजा राम सिंह की मृत्यु के बाद वे बल्लभगढ़ की गद्दी पर बैठे। युवा अवस्था से ही उनमें पराक्रम और देशभक्ति की भावना प्रबल थी। वे जनता में न्यायप्रिय, दयालु और साहसी शासक के रूप में प्रसिद्ध हुए।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में राजा नाहर सिंह ने बहादुर शाह ज़फ़र का साथ देकर अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह किया। उनका बल्लभगढ़ किलाक्रांतिकारियों का गढ़ बन गया, जहाँ से अंग्रेज़ों के खिलाफ योजनाएँ बनाई जाती थीं। उन्होंने आसपास के इलाक़ों के जाट, गुर्जर, राजपूत और अन्य समुदायों को संगठित किया और दिल्ली में क्रांतिकारियों को सहयोग दिया। अंग्रेज़ उन्हें सबसे बड़े ख़तरों में गिनते थे क्योंकि उनके नेतृत्व ने आंदोलन को गति दी थी।
अंग्रेज़ों ने चालाकी से उन्हें गिरफ्तार कर लिया और दिल्ली में कैद कर दिया। 9 जनवरी 1858 को दिल्ली के चाँदनी चौक पर उन्हें फाँसी दे दी गई। उनकी शहादत ने देशभर के लोगों को आज़ादी के लिए प्रेरित किया।
राजा नाहर सिंह आज भी हरियाणा और भारत के गौरवपूर्ण इतिहास के अमर शहीद माने जाते हैं। उनका किला आज “नाहर सिंह पैलेस” के नाम से जाना जाता है और उनकी स्मृति में हर साल “शहादत दिवस” मनाया जाता है। उन्होंने जिस साहस और बलिदान का परिचय दिया, वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की धरोहर है और आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा।
स्वामी केशवानंद
स्वामी केशवानंद (1883–1982) राजस्थान के महान संत, शिक्षाविद और समाज सुधारक थे। उनका जन्म 11 नवम्बर 1883 को सीकर जिले के गांव मोकलसर में हुआ था। बचपन से ही उनमें धार्मिक आस्था, त्याग और समाज सेवा की भावना प्रबल थी। युवावस्था में वे आर्य समाज से जुड़े और महर्षि दयानंद सरस्वती के विचारों से प्रभावित होकर समाज सुधार और शिक्षा को जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाया।
स्वामी केशवानंद ने राजस्थान में शिक्षा का प्रकाश फैलाने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने भीलवाड़ा जिले के बोरखड़ा में गुरुकुल आश्रम की स्थापना की, जहाँ ग्रामीण और निर्धन बच्चों को संस्कृत, वेद और आधुनिक शिक्षा का समन्वय सिखाया जाता था। उनका मानना था कि शिक्षा ही समाज की प्रगति का आधार है और इसके बिना राष्ट्र सशक्त नहीं हो सकता। वे स्वयं सादा जीवन जीते थे और अपने शिष्यों को भी संयम, अनुशासन और देशभक्ति की प्रेरणा देते थे।
स्वामी केशवानंद स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े और अंग्रेज़ों के खिलाफ आवाज़ उठाई। उन्होंने लोगों को आत्मनिर्भर बनने और सामाजिक कुरीतियों से दूर रहने का संदेश दिया। उनका जीवन शिक्षा, सेवा और समाज सुधार के लिए समर्पित रहा।
1982 में 99 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। आज भी उनका नाम राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत में श्रद्धा के साथ लिया जाता है। उनके द्वारा स्थापित संस्थाएँ आज भी ग्रामीण शिक्षा और सामाजिक उत्थान में कार्यरत हैं। वे सच्चे अर्थों में एक महान संत, शिक्षाविद और समाज सुधारकथे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज को प्रकाश देने में समर्पित कर दिया।
श्री कुम्भाराम आर्य
श्री कुम्भाराम आर्य (1914–1994) राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर किसान नेता और समाज सुधारक थे। उनका जन्म 1914 में नागौर जिले के लाडनूं तहसील के एक छोटे से गाँव में हुआ था। वे बचपन से ही सरल, ईमानदार और संघर्षशील स्वभाव के थे। स्वतंत्रता आंदोलन से प्रेरित होकर उन्होंने कम उम्र में ही अंग्रेज़ों के खिलाफ आवाज़ उठाई और भारत की आज़ादी के लिए सक्रिय भूमिका निभाई।
आजादी के बाद कुम्भाराम आर्य ने अपना पूरा जीवन किसानों और आमजन के कल्याण को समर्पित कर दिया। वे किसानों की समस्याओं को राजनीति के केंद्र में लाने वाले अग्रणी नेताओं में गिने जाते हैं। भूमि सुधार, सिंचाई, खाद–बीज और फसल के उचित दाम जैसे मुद्दों पर उन्होंने कई आंदोलन चलाए। उनका मानना था कि भारत की असली शक्ति गाँवों और किसानों में है, इसलिए किसानों को सशक्त करना देश की प्रगति की शर्त है।
कुम्भाराम आर्य का व्यक्तित्व सादगी, ईमानदारी और नैतिकता का प्रतीक था। वे हमेशा ग्रामीण विकास, शिक्षा और सामाजिक न्याय के पक्षधर रहे। जनता के बीच उनकी छवि इतनी साफ और प्रिय थी कि लोग उन्हें “राजस्थान का गांधी” कहकर सम्मानित करते थे। 1994 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनके विचार और संघर्ष आज भी किसानों और समाज के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।
सर छोटूराम
सर छोटूराम (1881–1945) पंजाब–हरियाणा क्षेत्र के महान किसान नेता, समाज सुधारक और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ थे। उनका जन्म 24 नवम्बर 1881 को रोहतक जिले के गढ़ी सांपला गाँव (अब हरियाणा) में एक जाट किसान परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्होंने किसानों और गरीबों की कठिनाइयाँ देखीं और उनके उत्थान का संकल्प लिया। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की, लेकिन जल्दी ही समझ गए कि असली संघर्ष किसानों को शोषण से मुक्त कराना है।
उन्होंने किसानों के जीवन को सुधारने के लिए अनेक ठोस कदम उठाए। सबसे महत्वपूर्ण योगदान था सहकारी समितियों की स्थापना और कृषि सुधार कानूनों को लागू कराना। इन कानूनों के माध्यम से किसानों को साहूकारों और जमींदारों के अत्याचार से राहत मिली और उन्हें अपनी ज़मीन पर हक़दारी और स्वतंत्रता का अनुभव हुआ। उनकी नीतियों ने किसानों को आत्मनिर्भर बनाया और ग्रामीण समाज में नई ऊर्जा का संचार किया।
सर छोटूराम शिक्षा के बड़े पैरोकार थे। उनका मानना था कि शिक्षा ही समाज की प्रगति की कुंजी है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना को बढ़ावा दिया। जनता के बीच उनकी छवि इतनी सशक्त और ईमानदार थी कि लोग उन्हें “किसानों का मसीहा” कहकर सम्मानित करते थे।
3 जनवरी 1945 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी स्मृति आज भी किसानों के संघर्ष और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा है। हरियाणा में रोहतक के पास बना सर छोटूराम स्मारक (सांपला) उनकी याद में किसानों को प्रेरित करता है। वे सच्चे अर्थों में ग्रामीण भारत के उद्धारक और किसान हितों के रक्षक थे।
ठाकुर देशराज सिंह
ठाकुर देशराज सिंह (1896–1970) जाट समाज के प्रख्यात इतिहासकार, लेखक और समाज सुधारक थे। उनका जन्म 1896 में उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे बचपन से ही जिज्ञासु, विद्वान और समाज की उन्नति के लिए समर्पित रहे। शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपना जीवन लेखन, समाज सुधार और ऐतिहासिक अनुसंधान को समर्पित किया।
उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान था उनकी अमूल्य कृति “जाट इतिहास”, जिसमें उन्होंने जाट समाज की प्राचीन गौरवशाली परंपराओं, वीरता और संस्कृति का विस्तार से वर्णन किया। इस पुस्तक ने न केवल जाट समाज को अपने अतीत से परिचित कराया बल्कि उन्हें गर्व और आत्मसम्मान की नई भावना भी दी। ठाकुर देशराज का मानना था कि समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब वह अपनी जड़ों और इतिहास को पहचाने।
वे शिक्षा और संगठन के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने युवाओं को जागरूक करने के लिए आंदोलन चलाए और समाज में संगठन और एकता का संदेश दिया। ठाकुर देशराज सिंह का जीवन सादगी, सेवा और साहित्यिक योगदान का प्रतीक था। वे मानते थे कि शिक्षा ही सामाजिक प्रगति की कुंजी है और इसलिए उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार पर विशेष बल दिया।
1970 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी रचनाएँ और विचार आज भी समाज को प्रेरणा देते हैं। ठाकुर देशराज सिंह को जाट समाज का इतिहासकार और पथप्रदर्शक माना जाता है। उनकी लिखी “जाट इतिहास” आज भी समाज और इतिहासकारों के लिए एक अमूल्य धरोहर है।
श्री परसराम मदेरणा
श्री परसराम मदेरणा (1923–2003) राजस्थान के वरिष्ठ कांग्रेस नेता, स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी थे। उनका जन्म 1923 में जोधपुर ज़िले के मादरेड़ा गाँव में हुआ। वे बचपन से ही पढ़ाई में मेधावी और समाज की समस्याओं को समझने वाले व्यक्तित्व थे। स्वतंत्रता संग्राम के समय उन्होंने युवावस्था में ही आंदोलन में भाग लिया और जेल भी गए। उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य हमेशा ग्रामीणों और वंचित वर्गों की सेवा रहा।
आजादी के बाद पारसराम मादरेड़ा सक्रिय राजनीति में आए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े। वे कई बार विधायक और सांसद बने तथा केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री के पद पर भी रहे। राजनीति में रहते हुए उन्होंने हमेशा ग्रामीण विकास, शिक्षा और समाज कल्याण को प्राथमिकता दी। उनके प्रयासों से राजस्थान में अनेक विकास कार्य हुए और गाँवों में शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाएँ बढ़ीं।
पारसराम मादरेड़ा की पहचान एक सादगीपूर्ण, ईमानदार और कर्मठ नेता के रूप में रही। वे जनता के बीच सीधे संवाद और ज़मीनी स्तर पर काम करने के लिए जाने जाते थे। उनका मानना था कि राजनीति का असली उद्देश्य जनता की सेवा है, न कि सत्ता का आनंद लेना।
2003 में उनका निधन हुआ, लेकिन वे आज भी राजस्थान की राजनीति में ईमानदारी और जनसेवा की मिसाल माने जाते हैं। उनके योगदान ने उन्हें राजस्थान के जन–नायक नेताओं की श्रेणी में खड़ा किया। ग्रामीण विकास और शिक्षा के क्षेत्र में उनके कार्य आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं।
श्री नाथूराम मिर्धा
श्री नाथूराम मिर्धा (1921–1996) राजस्थान के प्रख्यात राजनीतिज्ञ, किसान नेता और जनसेवक थे। उनका जन्म 20 अक्टूबर 1921 को नागौर जिले के कुचेरा गाँव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। वे बचपन से ही सरल, ईमानदार और संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी थे। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने राजनीति को जनता की सेवा का माध्यम बनाया और किसानों, ग्रामीणों तथा आमजन की समस्याओं को अपना जीवन–ध्येय बनाया।
नाथूराम मिर्धा स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों से ही सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहे। आज़ादी के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता बने और कई बार विधायक व सांसद चुने गए। उन्होंने केंद्र और राज्य स्तर पर मंत्री पद संभाले। उनकी राजनीति का मुख्य आधार किसान हित, ग्रामीण विकास और सामाजिक न्याय रहा। वे मानते थे कि भारत की असली ताक़त गाँवों और किसानों में निहित है, इसलिए उनकी प्रगति ही देश की प्रगति है।
उन्होंने शिक्षा, सिंचाई और स्वास्थ्य सुविधाओं को गाँव–गाँव तक पहुँचाने में अहम योगदान दिया। उनकी सादगी, ईमानदारी और जनता से सीधा जुड़ाव उन्हें लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय बनाता था। 27 दिसंबर 1996 को उनका निधन हुआ, लेकिन वे आज भी किसान राजनीति और जनसेवा की मिसाल माने जाते हैं। नाथूराम मिर्धा को सच्चे अर्थों में किसान नेता, समाज सुधारक और ईमानदार राजनीतिज्ञ के रूप में याद किया जाता है।
पहलवान दारा सिंह
पहलवान दारा सिंह (1928–2012) भारत के महान पहलवान, अभिनेता और राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने खेल और मनोरंजन दोनों ही क्षेत्रों में अमिट छाप छोड़ी। उनका जन्म 19 नवम्बर 1928 को पंजाब के अमृतसर ज़िले के धरमूचक गाँव में हुआ था। बचपन से ही वे बलशाली और कुश्ती में रुचि रखने वाले थे। गाँव की परंपरागत अखाड़ों से उन्होंने कुश्ती की शुरुआत की और धीरे–धीरे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचे।
दारा सिंह ने अपने शानदार दांव–पेंच और दमखम से दुनिया भर में भारत का नाम रोशन किया। उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में जीत हासिल की और 1954 में कॉमनवेल्थ कुश्ती चैंपियनशिप जीती। 1968 में उन्हें “रुस्तम-ए-हिंद” की उपाधि दी गई। उनकी ऊँचाई, ताक़त और व्यक्तित्व के कारण वे युवाओं के आदर्श बन गए। उन्होंने विश्व प्रसिद्ध पहलवानों को पराजित किया और भारत की कुश्ती को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
कुश्ती के साथ-साथ दारा सिंह ने फिल्मों और टेलीविज़न में भी असाधारण योगदान दिया। उन्होंने 100 से अधिक फिल्मों में काम किया और विशेष रूप से धार्मिक व एक्शन किरदारों में लोकप्रिय हुए। टीवी धारावाहिक रामायण (1987) में हनुमान की भूमिका निभाकर वे हर घर में पूजनीय और लोकप्रिय हो गए। उनकी यह भूमिका आज भी दर्शकों के दिलों में जीवित है।
दारा सिंह ने राजनीति में भी कदम रखा और राज्यसभा सदस्य बने। खेल, कला और राजनीति—तीनों क्षेत्रों में योगदान के कारण उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। 12 जुलाई 2012 को उनका निधन हुआ। दारा सिंह आज भी भारतीय खेल और सिनेमा के जीवंत प्रतीक माने जाते हैं, जिन्होंने परिश्रम, साहस और प्रतिभा से असंभव को संभव कर दिखाया।
श्री महेंद्र सिंह टिकैत
श्री महेंद्र सिंह टिकैत (1935–2011) भारत के सबसे प्रभावशाली किसान नेताओं में गिने जाते हैं। उनका जन्म 6 अक्टूबर 1935 को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर ज़िले के सिसौली गाँव में हुआ। वे साधारण किसान परिवार से थे और बचपन से ही किसानों की तकलीफ़ों और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों से भली-भाँति परिचित थे। उनके जीवन का ध्येय हमेशा किसानों की आवाज़ को सशक्त बनाना और उनकी समस्याओं का समाधान करना रहा।
1986 में उन्होंने भारतीय किसान यूनियन (BKU) का गठन किया और देखते ही देखते यह संगठन देश के सबसे मज़बूत किसान संगठनों में से एक बन गया। महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों के हितों के लिए कई बड़े आंदोलन किए, जिनमें गन्ने की उचित क़ीमत, बिजली दरों में कमी और क़र्ज़ माफी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। 1988 में दिल्ली के बोट क्लब पर हुआ उनका ऐतिहासिक किसान आंदोलन भारतीय किसान राजनीति का सबसे बड़ा जन-आंदोलन माना जाता है, जहाँ लाखों किसान एकत्रित हुए और सरकार को उनकी माँगें माननी पड़ीं।
उनकी शैली शांतिपूर्ण लेकिन मज़बूत रही। वे किसानों की समस्याओं को अहिंसात्मक ढंग से उठाते थे और आम जनता से गहरा जुड़ाव रखते थे। महेंद्र सिंह टिकैत ने हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को संगठित कर एक नई राजनीतिक और सामाजिक चेतना पैदा की।
15 मई 2011 को उनका निधन हुआ, लेकिन वे आज भी किसानों की आवाज़ और संघर्ष के प्रतीक के रूप में याद किए जाते हैं। महेंद्र सिंह टिकैत ने यह साबित किया कि यदि किसान एकजुट हों तो वे अपनी ताक़त से देश की नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं। वे सच्चे अर्थों में किसानों के मसीहा और जननायक थे।
श्री साहिब सिंह वर्मा
श्री साहिब सिंह वर्मा (1943–2007) भारतीय राजनीति के एक सादगीपूर्ण, ईमानदार और कर्मठ नेता थे। उनका जन्म 15 मार्च 1943 को दिल्ली के नांगलोई गाँव में हुआ। साधारण किसान परिवार से आने वाले साहिब सिंह वर्मा ने कठिन परिश्रम और शिक्षा के बल पर राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रमुख नेताओं में से एक रहे और दिल्ली, हरियाणा तथा उत्तर भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखते थे।
साहिब सिंह वर्मा 1996 में दिल्ली के मुख्यमंत्री बने और 1998 तक इस पद पर रहे। अपने कार्यकाल में उन्होंने दिल्ली में बिजली, पानी और शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की दिशा में कई कदम उठाए। उनका स्वभाव सीधा-सादा और जनता से जुड़ा हुआ था, जिसके कारण वे ग्रामीण इलाकों और आम नागरिकों के बीच बेहद लोकप्रिय थे। मुख्यमंत्री के रूप में वे बड़े-बड़े वादों के बजाय ज़मीनी कार्यों पर विश्वास करते थे।
मुख्यमंत्री पद के बाद वे केंद्र सरकार में भी मंत्री बने। ग्रामीण विकास और श्रम–रोज़गार से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया। हरियाणा और दिल्ली के सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास में उनकी भूमिका अहम रही।
30 जून 2007 को एक सड़क दुर्घटना में उनका असमय निधन हो गया। लेकिन साहिब सिंह वर्मा आज भी अपनी सादगी, ईमानदारी और विकासपरक सोच के लिए याद किए जाते हैं। उन्हें दिल्ली के उन नेताओं में गिना जाता है जिन्होंने राजधानी और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को नई दिशा देने का काम किया।
श्री ओमप्रकाश चौटाला
श्री ओमप्रकाश चौटाला (जन्म 5 जनवरी 1935) हरियाणा की राजनीति के एक प्रभावशाली और विवादास्पद नेता रहे हैं। वे हरियाणा के पूर्व उप–प्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल के पुत्र हैं। किसान परिवार से आने वाले ओमप्रकाश चौटाला ने अपने पिता के राजनीतिक आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए किसानों और ग्रामीणों के मुद्दों को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। उनकी राजनीतिक यात्रा में संघर्ष, उतार–चढ़ाव और सत्ता का अनुभव तीनों ही रहे।
ओमप्रकाश चौटाला चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल 1989–90, 1990–91, 1991 और 1999–2005 के बीच रहा। वे भारतीय राष्ट्रीय लोकदल (INLD) के संस्थापक और प्रमुख नेता रहे। उनके नेतृत्व में हरियाणा में सड़क, बिजली और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में सुधार हुआ। उन्होंने किसानों और ग्रामीण समाज के लिए कई योजनाएँ चलाईं और हरियाणा को उत्तर भारत की अग्रणी कृषि–प्रधान अर्थव्यवस्था बनाने का प्रयास किया।
हालाँकि उनके राजनीतिक जीवन में विवाद भी रहे। 2003 में शिक्षक भर्ती घोटाले के मामले में उन पर आरोप लगे और बाद में 2013 में अदालत द्वारा उन्हें दोषी ठहराया गया। इसके बावजूद उनके समर्थकों के बीच उनकी लोकप्रियता लंबे समय तक बनी रही।
ओमप्रकाश चौटाला हरियाणा की राजनीति में एक सशक्त और करिश्माई नेता के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने अपने पिता देवी लाल की किसान राजनीति की परंपरा को आगे बढ़ाया और लंबे समय तक राज्य की राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभाई। उनका जीवन संघर्ष, नेतृत्व और विवादों का मिश्रण है, लेकिन उन्हें हरियाणा के इतिहास में एक प्रभावशाली नेता के रूप में हमेशा याद किया जाएगा।
कैप्टन अमरिंदर सिंह
कैप्टन अमरिंदर सिंह (जन्म 11 मार्च 1942) पटियाला के शाही परिवार से संबंध रखते हैं और पंजाब की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। वे महाराजा यादविंदर सिंह के पुत्र हैं। अमरिंदर सिंह ने अपनी शुरुआती पढ़ाई देहरादून के प्रसिद्ध दून स्कूल से की और इसके बाद भारतीय सेना में शामिल हो गए। 1965 के भारत–पाक युद्ध में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और अपनी बहादुरी का परिचय दिया। सेना से सेवा निवृत्त होने के बाद उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और अपने जीवन को जनता की सेवा को समर्पित कर दिया।
राजनीति में आने के बाद वे 1980 के दशक में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और धीरे–धीरे पंजाब की राजनीति में एक मज़बूत चेहरा बनकर उभरे। वे दो बार पंजाब के मुख्यमंत्री रहे — पहली बार 2002 से 2007 और दूसरी बार 2017 से 2021 तक। अपने कार्यकाल में उन्होंने पंजाब में उद्योग, बुनियादी ढाँचे और शिक्षा पर ध्यान दिया। किसानों के लिए कर्ज़ माफी योजनाएँ और सैनिकों व उनके परिवारों के लिए कल्याणकारी नीतियाँ भी उनके शासन की प्रमुख उपलब्धियाँ रही।
कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी शाही पृष्ठभूमि और सैनिक अनुशासन के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने पंजाब को राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक चुनौतियों से उबारने का प्रयास किया। 2021 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी से अलग होकर अपनी नई पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस की स्थापना की और बाद में भारतीय जनता पार्टी (BJP) से भी जुड़े। उनका जीवन सेवा, नेतृत्व और दृढ़ संकल्प का उदाहरण है। वे आज भी पंजाब की राजनीति के एक मज़बूत और लोकप्रिय नेता माने जाते हैं।
महारानी वसुंधरा राजे
महारानी वसुंधरा राजे (जन्म 8 मार्च 1953) धौलपुर राजघराने की राजकुमारी और भरतपुर शाही परिवार की बहू हैं। वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) की वरिष्ठ नेता और राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। वसुंधरा राजे के पिता माधवराव सिंधिया ग्वालियर राजघराने से थे और उनकी माता विजयाराजे सिंधिया भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण हस्ती थीं। इस तरह वे सिंधिया और धौलपुर – दोनों शाही परिवारों से जुड़ी हुई हैं।
वसुंधरा राजे ने राजनीति की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी से की और 1989 में पहली बार लोकसभा सदस्य चुनी गईं। इसके बाद उन्होंने राज्य और केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। 2003 में वे पहली बार राजस्थान की मुख्यमंत्री बनीं और 2003 से 2008 तक राज्य का नेतृत्व किया। इसके बाद वे 2013 के चुनावों में भारी बहुमत से जीतकर दोबारा मुख्यमंत्री बनीं और 2013 से 2018 तक शासन किया। उनके कार्यकाल में राजस्थान में सड़क निर्माण, बिजली आपूर्ति, महिला सशक्तिकरण, पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई।
वसुंधरा राजे को एक सशक्त, दूरदर्शी और आधुनिक सोच वाली महिला नेता माना जाता है। उन्होंने राजस्थान को निवेश और पर्यटन का केंद्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। उनकी योजनाओं जैसे जल स्वावलंबन अभियान और भामाशाह योजना ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में विकास को नई दिशा दी। वे राजस्थान ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रभावशाली चेहरा रही हैं और आज भी भाजपा की वरिष्ठ नेताओं में गिनी जाती हैं।
श्री विक्रम वर्मा
श्री विक्रम वर्मा (जन्म 15 जनवरी 1944) मध्यप्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेता और प्रख्यात राजनीतिज्ञ रहे हैं। उनका जन्म धार ज़िले के धरमपुरी क्षेत्र में हुआ था। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने राजनीति को अपना जीवन–ध्येय बनाया और समाज सेवा के माध्यम से भाजपा संगठन में सक्रिय हुए। उनकी गिनती उन नेताओं में होती है जिन्होंने जमीनी स्तर से आगे बढ़कर राज्य और केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
विक्रम वर्मा कई बार विधायक और सांसद चुने गए। वे मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री रहे और बाद में केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में युवा मामले और खेल मंत्री बने। उनके कार्यकाल में खेल संरचना को मज़बूत करने और युवाओं को राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवसर दिलाने की दिशा में कई योजनाएँ चलाई गईं। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी विशेष ज़ोर दिया।
उनकी पहचान एक सादगीपूर्ण, ईमानदार और कर्मठ नेता के रूप में रही। अपने क्षेत्र के लोगों से उनका गहरा जुड़ाव था और वे जनता की समस्याओं को नज़दीक से समझकर उनके समाधान के लिए प्रयासरत रहते थे। राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने सादगी और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी, जिसके कारण वे जनता के बीच आदरणीय बने रहे।
श्री विक्रम वर्मा भारतीय जनता पार्टी के उन नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम माना। उनका योगदान विशेषकर युवाओं और खेलों के क्षेत्र में उल्लेखनीय है। वे आज भी मध्यप्रदेश और भारतीय राजनीति में एक सशक्त और ईमानदार नेता के रूप में याद किए जाते हैं।